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तू ही दुनिया है मेरी

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Lyrics

तू ही दुनिया है मेरी...
​इस अजनबी शहर की भीड़ में जब भी खुद को अकेला पाया है,
तेरी यादों के साए ने मुझे हमेशा गले से लगाया है।
लोग ढूंढते हैं ख़ुदा को आसमा-दर-आसमां,
मैंने तो अपनी बंद आँखों में सिर्फ़ तुझे ही बसाया है।
​तू रात की पहली ओस है, तू ही सुबह की पहली धूप,
मेरे हर लफ्ज़ में ढल गया है बस तेरा ही हसीं रूप।
ज़िंदगी की इस कशमकश में तू ही मेरा सुकूँ है,
धड़कनें जो चलती हैं मेरी, वो सिर्फ़ तेरा ही जूनून है।
​तू मुस्कुराए: तो खिल उठती है मेरी कायनात।
​तू रूठ जाए: तो थम जाती है जज़बातों की बारात।
​"लोग कहते हैं कि जन्नत बहुत खूबसूरत है,
मैं कहता हूँ कि मुझे जन्नत की क्या ज़रूरत है?
जब मेरा ख़ुदा, मेरी कायनात, मेरी दुनिया... सिर्फ़ तू है।"
तू ही आख़िरी ख़्वाहिश
​अब कोई और तमन्ना नहीं इस दिल-ए-नादान की,
तू ही धड़कन है इस जिस्म की, तू ही रूह इस जान की।
चाहे बदले ये मौसम, चाहे रूठे ये सारा जहां,
तू थामे रखना हाथ मेरा, क्योंकि तू ही है मेरी ज़मीं और आसमां।
अब ख़ुदा से मांगू क्या, जब तुमको पा लिया मैंने,
ज़िन्दगी की हर एक सांस को, तेरे नाम लिख दिया मैंने।
ज़मीन से आसमां तक, जहां भी नज़र जाती है,
मुझे हर एक ज़र्रे में, बस तेरी सूरत नज़र आती है।
लोग ढूंढते हैं ख़ुदा को, पत्थरों के आशियानों में,
मेरी तो बंदगी, मेरी इबादत तुझमें सिमट जाती है।
​तुम हंसो तो खिलती है धूप, मेरी इस वीरान दुनिया में,
तुम्हारे अश्क गिरें तो, सावन की घटा छा जाती है।
कि अब इस दिल की धड़कन की, कोई और वजह नहीं,
"तुही दुनिया है मेरी, तेरे सिवा कोई और दूजा नहीं।"
मेरे जीने का सलीका, तुमसे ही तो आया है,
इस तपती हुई धूप में, तुम ही तो ठंडी साया है।
चाहत के इस समंदर में, हम कुछ इस तरह डूब गए—
​तुम मेरी सुबह की पहली किरण हो: जो अंधेरों को मिटाती है।
​तुम मेरी रात का वो सुकून हो: जो ख़्वाबों को सजाती है।
​तुम मेरी हर मर्ज़ की दवा हो: जो रूह को चैन दिलाती है।
रिश्ता हमारा यह सिर्फ़ लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं,
तुम धड़कते हो मुझमें इस कदर, जैसे कोई छुपा हुआ राज़ हो।
जिस्म दो सही हमारे, पर जान तो एक ही है,
तुम्हारे बिना यह ज़िन्दगी, महज़ एक बेजान लिबास ही है।"
लकीरें हाथ की मेरी, तुम्हारे नाम से मुकम्मल हैं,
तुम्हारी याद के साए में, मेरे सारे लम्हे मख़मल हैं।
वक़्त बदले, चाहे बदले यह सारा जहाज़, पर सुनो—
मेरा हर एक जनम, बस तुम्हारी चाहत के लिए ही अव्वल है।
​तुम्हीं से शुरू हुई, तुम्हीं पर ख़त्म होगी यह कहानी,
तुम ही मेरी आख़िरी ख़्वाहिश, तुम ही मेरी जिंदगानी।
भटक रहा था इस कायनात के अंतहीन अंधेरों में,
तुम जो मिले तो मुसाफ़िर को उसका घर मिल गया।
अब न कोई ख़्वाहिश है जन्नत की, न ख़ुदा की तलाश,
तेरी बांहों के घेरे में मुझे मेरा पूरा संसार मिल गया।
​मेरी सुबह की पहली किरण, मेरी शाम का आख़िरी नूर हो,
तुमसे ही शुरू और तुम्हीं पर ख़त्म मेरी हर बात है।
लोग ढूंढते होंगे सकून न जाने किन-किन गलियों में,
मेरे लिए तो बस तुम्हारा साथ ही सबसे बड़ी सौगात है।
सूरज अपनी तपिश खो सकता है, चांद अपनी चांदनी,
मगर इस दिल से तुम्हारी हुकूमत कभी कम नहीं होगी।
ज़िन्दगी के इस समंदर में तुम वो साहिल हो मेरा,
जहां पहुंचकर मेरी हर लहर शांत हो जाती है।
​तुम ही मेरी बंदगी हो, तुम ही मेरी आवारगी,
सारे जहां की खुशियां एक तरफ़, और तेरी एक हंसी एक तरफ़।
अब इस जन्म में क्या, हर आने वाले जनम में यही दुहराऊंगा,
कि "तू ही दुनिया है मेरी, और मैं सिर्फ़ तेरा ही कहलाऊंगा।"

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