कभी मरुथल सी प्यास है जिंदगी,
कभी सावन की आस है जिंदगी।
जो मिल गया उसे खोने का डर,
जो न मिला उसे पाने की तलाश है जिंदगी।
जिंदगी और है क्या...
चंद साँसों का उधार है जिंदगी,
उम्मीदों का कारोबार है जिंदगी।
तारीखों के पन्नों पर सिमटा हुआ,
वक़्त का एक छोटा सा कतरा है जिंदगी।
धूप में छाँव की तलाश का नाम है,
थक कर सुस्ताने वाली शाम का नाम है।
हजारों शोर के बीच जो सुनाई दे,
उसी एक अनकहे ख़ामोश पैगाम का नाम है।
कभी जीत का शोर, कभी हार की चुप्पी,
कभी भरी महफ़िल, कभी तन्हा सी कुप्पी।
मिट्टी से शुरू, मिट्टी में ही खत्म,
फकत दो पल की ही तो मेहमान है जिंदगी।
जिंदगी और है क्या...
गिरकर संभल जाने का हुनर है,
बिना मंजिल के भी एक सफर है।
दर्द को पीकर जो मुस्कुरा दे 'दोस्त',
बस उसी हौसले का दूसरा घर है जिंदगी।
अगर हारना और जीतना ही सफर है,
अगर खोना और पाना ही मुकद्दर है,
तो मन के किसी कोने में एक सवाल आता है—
"जिंदगी यही है, तो फिर जिंदगी में है क्या?”
कच्चे रास्तों पर नंगे पाँव का चलना,
गिरकर संभलना, फिर संभलकर फिसलना।
भीड़ में खुद को तनहा सा पाना,
और तन्हाई में पूरी कायनात से हाथ मिलाना।
जिंदगी में है... एक अनवरत संघर्ष की लय।
पतझड़ के बाद फिर से कोपल का फूटना,
टूटे हुए रिश्तों का खामोशी से जुड़ना।
शाम की चाय में यादों की मिठास,
और हर अंधेरी रात के बाद सूरज पर विश्वास।
जिंदगी में है... उम्मीद की एक कभी न बुझने वाली लौ।
कभी बेमतलब की बातों पर खिलखिलाना,
कभी छोटी सी बात पर समंदर सा बह जाना।
किताबों के पन्नों में दबी सूखी वो पंखुड़ी,
और बरसों बाद मिली वो बचपन की लंगड़ी।
जिंदगी में है... महसूस करने की असीमित शक्ति।
बिना किसी नक्शे के बस चलते ही जाना,
परायों में अपनों को ढूंढते जाना।
मिट्टी से निकलकर फिर मिट्टी में मिल जाना,
पर इस बीच, एक रूहानी छाप छोड़ जाना।
जिंदगी में है... खुद को खुद से मिलाने का मौका।