सुन ना... ओ हो...
ज़िंदगी की राहों में भीड़ है क़यामत की,
हर शख़्स दौड़ रहा है, यहाँ तलाश है राहत की।
चेहरों के इस समंदर में कोई चेहरा मुकम्मल नहीं,
अजीब बाज़ार है यह, जहाँ कोई अपना नहीं।
दौड़ रहे हैं सब, पर मंज़िल का किसी को पता नहीं,
इस अंधी रफ़्तार में, ठहरने की कोई वजह नहीं।
हाँ, इस हुजूम में सांस लेना भी मुश्क़िल काम है,
हर मोड़ पर सिर्फ़ मतलबी और अधूरे सलाम हैं।
भीड़ चाहे जितनी हो, तुम अपना रास्ता खुद बनाना,
इस शोर-शराबे के बीच भी, सादगी का तराना गुनगुनाना।
यही भीड़ तुम्हें एक दिन तुम्हारी मंज़िल का पता देगी,
और यही ज़िंदगी, तुम्हें जीने का मज़ा देगी।
हाँ, जीने का मज़ा देगी...
कंधे से कंधा छिलता है, पर दिल को कोई छूता नहीं,
इस शोर-शराबे के शहर में, कोई किसी का होता नहीं।
जीतने की इस होड़ में, हर रूह जैसे हारी है,
बढ़ते हुए इन क़दमों में एक अजब सी बेक़रारी है।
अपनी कश्ती को पार लगाओ, अपने हौसले के ज़ोर से,
क्यों डरना इस हुजूम से, क्यों घबराना इस शोर से।
भीड़ चाहे जितनी हो, तुम अपना रास्ता खुद बनाना,
इस शोर-शराबे के बीच भी, सादगी का तराना गुनगुनाना।
यही भीड़ तुम्हें एक दिन तुम्हारी मंज़िल का पता देगी,
और यही ज़िंदगी, तुम्हें जीने का मज़ा देगी।
सुन ना... क्या बात...
सादगी ही तुम्हारी इस क़यामत के पार जाएगी,
ज़िंदगी की राहों में भीड़ है क़यामत की...