अरे सुनो, ये कैसा खेल है?
आस्था का यहाँ व्यापार है।
गरीब अपनी खून-पसीने की कमाई लाता है,
दान पात्र में श्रद्धा से सब सौंप जाता है।
पर महलों में बैठे रक्षक भक्षक बन गए,
भक्तों के सारे सपने मिट्टी में मिल गए।
ट्रस्ट के नाम पर जेबें अपनी भरते हैं,
धर्म की आड़ में ये कैसा पाप करते हैं?
मंदिर के नाम पर सियासत का ये धंधा,
गरीब की पुकार पे कानून यहाँ अंधा।
नेता और ट्रस्टी सब मिलकर खाते हैं,
सच्ची इबादत को ये धूल में मिलाते हैं।
कैसा ये दौर आया, कैसी ये रीत है,
धर्म के नाम पर बस कुर्सी से प्रीत है।
नेताओं का हाथ इनके सिर पर सदा रहता,
आम आदमी यहाँ हर जुल्म सहता।
वोटों की खातिर वो बांटते हैं नफरत,
पैसों के लिए बदल देते हैं फितरत।
सच्चा धरम तो इंसानियत सिखाता,
पर लालच का चश्मा इन्हें सच नहीं दिखाता।
मंदिर के नाम पर सियासत का ये धंधा,
गरीब की पुकार पे कानून यहाँ अंधा।
नेता और ट्रस्टी सब मिलकर खाते हैं,
सच्ची इबादत को ये धूल में मिलाते हैं।
कैसा ये दौर आया, कैसी ये रीत है,
धर्म के नाम पर बस कुर्सी से प्रीत है।
अरे जागो!
अब तो आंखें खोलो यार,
कैसा ये धर्म का व्यापार।