जिंदगी यही है, तो फिर जिंदगी में है क्या?”
कच्चे रास्तों पर नंगे पाँव का चलना,
गिरकर संभलना, फिर संभलकर फिसलना।
भीड़ में खुद को तनहा सा पाना,
और तन्हाई में पूरी कायनात से हाथ मिलाना।
जिंदगी में है... एक अनवरत संघर्ष की लय।
पतझड़ के बाद फिर से कोपल का फूटना,
टूटे हुए रिश्तों का खामोशी से जुड़ना।
शाम की चाय में यादों की मिठास,
और हर अंधेरी रात के बाद सूरज पर विश्वास।
जिंदगी में है... उम्मीद की एक कभी न बुझने वाली लौ।
कभी बेमतलब की बातों पर खिलखिलाना,
कभी छोटी सी बात पर समंदर सा बह जाना।
किताबों के पन्नों में दबी सूखी वो पंखुड़ी,
और बरसों बाद मिली वो बचपन की लंगड़ी।
जिंदगी में है... महसूस करने की असीमित शक्ति।
बिना किसी नक्शे के बस चलते ही जाना,
परायों में अपनों को ढूंढते जाना।
मिट्टी से निकलकर फिर मिट्टी में मिल जाना,
पर इस बीच, एक रूहानी छाप छोड़ जाना।
जिंदगी में है... खुद को खुद से मिलाने का मौका।
जिंदगी कोई तिजोरी नहीं, जिसे खोलकर देखा जाए कि अंदर क्या है। जिंदगी तो वह 'हवा' है जिसे देखा नहीं जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
"जिंदगी में 'क्या है' इसका जवाब कोई बाहर नहीं देगा,
ये तो वो खाली कैनवास है जिस पर आपको अपनी पसंद का रंग भरना है।
अगर ये सिर्फ सांस लेना है, तो ये बोझ है,
और अगर ये हर सांस को जीना है, तो यही 'खोज' है।”
वही सुबह की भागदौड़, वही शाम की थकान,
वही समझौतों में लिपटा, आधा-अधूरा आसमान।
अगर सांसों का चलते रहना ही बस बंदगी है,
तो सवाल वाजिब है... क्या यही जिंदगी है?
पर ठहर कर देखो तो...
जिंदगी महज़ कैलेंडर की तारीखें नहीं,
जिंदगी तो वो एहसास है, जो कहीं खो गया है।
वो बचपन की बेफिक्र हंसी, जो अब एक याद है,
वो बारिश की पहली बूंद, जिसमें मिट्टी की फरियाद है।
जिंदगी में क्या है?
जिंदगी में है—हार के बाद फिर से खड़े होने का साहस,
अंधेरी सुरंग के अंत में चमकता हुआ वो छोटा-सा प्रकाश।
किसी अजनबी की मदद कर, जो दिल को मिलता है सुकून,
किसी अधूरी ख्वाहिश को पूरा करने का वो पागल-सा जुनून।