चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा,
इस ख़ामोश मोहब्बत का साज़ मैं न दूँगा।
तुम समझ सको तो समझ लेना धड़कनों से,
अपने होंठों को हिलने का अंदाज़ मैं न दूँगा।
दूर बैठकर ही तेरी ख़ैरियत की दुआ करूँगा,
तुझसे मिलने की अब न कोई इल्तिज़ा करूँगा।
तू महके किसी और के आँगन में गुलाब बनकर,
मैं काँटा बनकर भी तुझपे कोई आंच न आने दूँगा।
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...
नज़रे मिलेंगी तो नज़रों से ही बात होगी,
ग़म की धूप में भी यादों की बरसात होगी।
चाहत की इस इबादत को छुपा कर रखूँगा दिल में,
ज़माने को अपने इस गहरे राज़ की आवाज़ मैं न दूँगा।
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...
चाहूँगा तुझे उम्र भर एक इबादत की तरह,
दिल में छुपा कर रखूँगा बेशकीमती अमानत की तरह।
होंठ सिल लिए हैं मैंने कि रुसवा न हो नाम तेरा,
मेरी आँखों से पढ़ लेना, लफ्ज़ों को शिकायत की तरह।
तेरी राह में बिछ जाएँगे मेरी पलकों के साये,
पर तेरे सफ़र को कोई बंदिश न दूँगा,
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...
जब भी गुज़रोगे तुम मेरे करीब से अनजान बनकर,
मैं जी लूँगा उस पल को खुदा का अहसान मानकर।
पुकारने को तड़पेगा दिल, मगर उफ़ तक न करेगा,
ख़ामोशी की चादर ओढ़ लूँगा एक बेज़ान बनकर।
तेरी दुनिया खुशहाल रहे, बस यही दुआ है मेरी,
तेरी महफ़िल को अपने दर्द का साज़ मैं न दूँगा,
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...
न कोई शिकवा होगा, न कोई दावा होगा,
अब इस एकतरफ़ा इश्क़ का न कोई गवाह होगा।
तू समझे या न समझे, ये तक़दीर है मेरी,
मेरा हर कतरा बस तेरी ही चाहत में तबाह होगा।
दूर रहकर भी तुझसे ही मुकम्मल है वजूद मेरा,
इस रूहानी रिश्ते को जिस्म का लिबास मैं न दूँगा,
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा,
इस ख़ामोश मोहब्बत का भरम टूटने न दूँगा।
तुम दूर ही सही, मेरी धड़कनों का सुकून हो,
पर इस चाहत से तुम्हारी राहें रुकने न दूँगा..
न कोई शिकवा होगा, न कोई इल्तिज़ा होगी,
मेरी ख़ामोशी ही अब मेरी वफ़ा होगी।
तुम गुज़र जाओगे पास से एक अजनबी की तरह,
मेरी आँखें झुकेंगी, पर पलकें नम न होने दूँगा।
दूर से ही देख कर मुस्कुरा लिया करूँगा,
तेरी दी हुई यादों से दिल को बहला लिया करूँगा।
इस पाक से रिश्ते में ज़माने की बंदिशें न आएं,
इसलिए अपने लबों को कभी खुलने न दूँगा।
चाहूँगा तुझे इस कदर कि इबादत बन जाए,
मेरी ख़ामोशी ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त बन जाए।
पुकारेगा दिल तुम्हें हर सांस के साथ, मगर...
ज़ुबाँ तक आए वो सदा, ये गुस्ताख़ी मैं होने न दूँगा।
आवाज़ मैं न दूँगा... पर तुम मुझे महसूस करना,
हवा के हर झोंके में, मेरी चाहत का दीदार करना।
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा,
इस ख़ामोश मोहब्बत का कोई साज़ मैं न दूँगा।
तड़पेगा दिल मेरा तेरी ही आरज़ू में,
पर इस बेबसी को कोई अवाज़ मैं न दूँगा।
महसूस कर सकोगे तुम मेरी धड़कनों को,
पर लफ्ज़ बनकर होंठों पर मैं आऊँगा नहीं।
दुआओं में सिर्फ़ तेरा ही नाम होगा,
पर महफ़िल में कभी तुझको जताऊँगा नहीं।
इश्क़ की इस इबादत को पाकीज़ा ही रहने दो,
नुमाइश का इसे कोई अंदाज़ मैं न दूँगा।
चाहूँगा तुझे पर आवाज़ मैं न दूँगा...