तुम होती तो जिंदगी एक मुकम्मल नज्म होती,
हर मुश्किल राह, फूलों की एक रस्म होती।
पर तुम नहीं हो, और यही सच का सबसे बड़ा दुख है,
वरना मेरी हर बात की शुरुआत—'तुम होती तो' न होती।
तुम होती तो इन सूनी राहों में कोई आहट होती,
भीगी घास पर चलने की एक अनकही मुस्कुराहट होती।
हवा के झोंकों में जो ये बेनाम सी एक उदासी है,
शायद इनमें तुम्हारे लहराते आँचल की सुगन्ध घुली होती।
तुम होती तो चाय की प्याली का धुआँ यूँ ही बेकार न उड़ता,
बातों के सिलसिले होते, वक्त अपनी रफ्तार से न मुड़ता।
दीवारों पर टंगी इन तस्वीरों में भी जैसे जान आ जाती,
खामोश कमरा न होता, हर कोने से कोई नज़्म गुनगुनाती।
तुम होती तो शाम के ढलने का गम कुछ कम सताता,
सूरज भी शायद हमसे विदा लेने में थोड़ा कतराता।
चाँद की ये चाँदनी जो आज चुभती है बदन में,
तुम्हारे साथ ये शीतल छाँव बनकर मन को सहलाती।
तुम होती तो मेरे हर एक लफ्ज़ को एक नया अर्थ मिलता,
सादे से कागज पर भी उम्मीदों का कोई नया रंग खिलता।
मंजिलें तो खैर आज भी हैं, और सफर जारी है मेरा,
पर तुम होती... तो इस सफर में मेरा घर भी साथ चलता।
तुम होती तो ये बारिश महज पानी की बूंदें न होतीं,
रूह को भिगो देने वाली एक रूहानी सी बात होती।
दुनिया की इस भीड़ में जो ये अकेलापन सा पसरा है,
तुम होती... तो इस शोर में भी एक मुकम्मल शांति होती।
तुम होती तो यह शाम कुछ और ही रंग लाती,
खिड़की से झांकती चांदनी, तुम्हारे चेहरे की मुस्कान बन जाती।
चाय की प्याली में उठती वह भीनी-भीनी सी भाप,
तुम्हारी बातों की मिठास में घुलकर, एक नग़मा बन जाती।
तुम होती तो घर की ये खामोश दीवारें गुनगुनातीं,
सन्नाटों की चादर ओढ़कर ये सांसें यूँ न घबरातीं।
वो जो कोनों में जाले बुनती है उदासी अक्सर,
तुम्हारी एक पायल की झंकार से, पल भर में सिमट जातीं।
तुम होती तो रास्तों की थकान का एहसास न होता,
भीड़ में चलते हुए भी, ये दिल यूँ अकेला और हताश न होता।
कंधे पर सिर रखकर जब तुम थपकियां देतीं ज़रा सी,
तो ज़िंदगी का हर बोझ, फूल सा हल्का और ख़ास होता।