(सुन ना... ओ यारा...)
हम तुम्हें ढूंढ रहे हैं, दिल हमें ढूंढ रहा है...
दर-बदर भटक रही हैं, ये उदास निगाहें मेरी,
हवा के हर झोंके में, लगती है आहट तेरी।
मैं तुम्हें ढूंढता हूँ दुनिया के इस हज़ारों के मेले में,
और मेरा दिल मुझे ढूंढ रहा है, खुद के ही अकेले में।
अजीब कशमकश है मोहब्बत की इस राह में,
हम खोए हैं उनकी, और वो खोए हैं हमारी चाह में।
हम तुम्हें ढूंढ रहे हैं, दिल हमें ढूंढ रहा है,
जैसे कोई मुसाफिर, अपनी ही मंजिल से कट रहा है।
तुम कहाँ हो, ये खबर न तुमको है न हमको,
बस एक अनजाना सा धागा, दोनों को बुन रहा है।
शायद तुम भी कहीं बैठकर, मेरा ही नाम लिखते हो,
तभी तो बंद आँखों में भी, तुम मुझे ज़िंदा दिखते हो।
ये कैसी जुदाई है जो हमें पास ला रही है?
दूरी जितनी बढ़ रही है, धड़कन उतना ही गा रही है।
इक दिन ये तलाश थमेगी, इक दिन ये सफ़र पूरा होगा,
जो अधूरा सा लम्हा है, वो भी एक दिन पूरा होगा।
हम तुम्हें ढूंढ रहे हैं, दिल हमें ढूंढ रहा है,
जैसे कोई मुसाफिर, अपनी ही मंजिल से कट रहा है।
तुम कहाँ हो, ये खबर न तुमको है न हमको,
बस एक अनजाना सा धागा, दोनों को बुन रहा है।
तब तक ये सिलसिला, यूँ ही चलता रहेगा...
हम तुम्हें ढूंढते रहेंगे, और दिल हमें ढूंढता रहेगा।
(हाए... ढूंढता रहेगा...)