शमा जली, रात गहरी हुई, परवाना आया
इक आग का दरिया बीच में था, कैसा था ये साया
दूर से देखा उसको, दिल में मची इक हलचल (ओये)
भूल गया जग सारा, बन गया उसका पागल
उसे खबर थी जलेगा, हर साँस होगी राख
फिर भी चला उस ओर, ना पंखों की परवाह
शमा परवाना, ये कैसी प्रीत
जलना ही थी मंज़िल, ये इश्क़ की रीत
एक मिटा, दूजा पिघला, ये कैसा बंधन (क्या बात)
रूहों का मिलन है, ये सच्चा अर्पण
एक पल में हुआ ख़ाक, फिर भी वो मुस्कुराया
जीत गया अपनी चाहत, अमर नाम बनवाया
शमा भी पिघलकर रोई, बहते रहे मोम के आँसू
दुनिया क्या समझेगी, ये कैसा प्यार का जादू
शमा परवाना, ये कैसी प्रीत
जलना ही थी मंज़िल, ये इश्क़ की रीत
एक मिटा, दूजा पिघला, ये कैसा बंधन
रूहों का मिलन है, ये सच्चा अर्पण
शमा परवाना, ये अमर कहानी (है)
इश्क़ की रीत यही, ये प्रेम की निशानी