(सुन ना...)
ये खेल उसी का निराला रहा...
कोई मांगता रह गया उम्र भर, पर दामन खाली ही रहा
कोई बिन मांगे सब पा गया, ये कैसी उसकी रहमत है
लकीरें हाथ की सब बयां नहीं करतीं, नसीब अपना-अपना है
यहाँ वक़्त से पहले और मुक़द्दर से ज़्यादा, ना किसी ने पाया है
(ओए होए)
किसको क्या मिला यहाँ, सब अपनी-अपनी इनायत है
कोई महलों में भी रोता है, किसी की कुटिया में बरकत है
किसको क्या मिला यहाँ, सब अपनी-अपनी इनायत है
कोई महलों में भी रोता है, किसी की कुटिया में बरकत है
शिकवे-शिकायत की इस महफ़िल में, ज़रा मुस्कुरा कर देखो
जो पास है तुम्हारे, कभी उसे भी सीने से लगा कर देखो
हाथ खाली ज़रूर हैं मगर, दुआओं की बड़ी रियासत है
जो थोड़े में भी हँस दे, बस वही असली बादशाहत है
(कमाल है, हाँ)
किसको क्या मिला यहाँ, सब अपनी-अपनी इनायत है
कोई महलों में भी रोता है, किसी की कुटिया में बरकत है
सच तो यही है ए मुसाफ़िर, यहाँ सब उसकी ही इनायत है...
हाँ, सब उसकी इनायत है...