तेरी यादों की माला
दिन ढला, शाम हुई, फिर रात घिर आई है,
खामोश अंधेरे में फिर तेरी आहट सी आई है।
दुनिया की इस महफ़िल से खुद को जुदा करके,
बैठ गया हूँ मैं फिर से एक कोना सफ़र करके।
हाथों में कोई सुमरन की माला तो नहीं है,
पर सांसों ने तेरी यादों की माला बनाई है।
एक-एक मनका तेरी उन बातों का है,
एक-एक मोती उन हसीन मुलाकातों का है।
तेरी यादों की माला जपके, मैं रात बिताता हूँ,
तू पास नहीं है फिर भी, तुझे पास ही पाता हूँ।
जब पहला मनका फिरता है, तेरा मुस्कुराना याद आता है,
दबे पांव तेरा आना, और गले से लग जाना याद आता है।
बीच के कुछ मनके थोड़े भारी से लगते हैं,
जब दूर जाने के वो दिन, कुछ आंसुओं से सजते हैं।
पर शिकवा नहीं कोई, ना कोई गिला है खुदा से,
मोहब्बत तो आज भी वैसी ही है, तेरी इस रज़ा से।
लोग कहते हैं मैं तन्हा हूँ, पर उन्हें क्या मालूम,
मैं तो एक पूरी कायनात दिल में छुपाए बैठा हूँ।
हर सांस के साथ बस तेरा ही नाम आता है,
तेरी यादों का ये दरिया, मेरे बड़े काम आता है।
यूं ही चलती रहेगी ये सांसे, जब तक इस जिस्म में जान है,
तेरी यादों की ये माला ही, अब मेरी असली पहचान है।
मैं जपता रहूँगा इसे, जब तक मुकद्दर का खेल बाकी है,
तू मिले ना मिले, तेरी यादों का ये साथ ही काफी है।
धड़कन की लय पर, सांसों के धागे में,
मैंने एक अनमोल थाल सजाया है।
दुनिया की हर एक शोर-शराबे से दूर,
मैंने अपनी तन्हाई को ही मंदिर बनाया है।
हाथों में कोई काठ का मनका नहीं,
न ही कोई मन्नत का रेशमी धागा है,
पर तेरी यादों की माला जपके,
यह बावरा मन रात भर जागा है।
एक नाम तेरा, एक अक्स तेरा,
हर सांस में जैसे घुल सा गया,
मैंने जो पहला मनका फेरा,
सदियों का अंधेरा ढल सा गया।