मैं
हि
न्
दू
हूँ,
यह
गर्
व
नहीं,
यह
मे
रा
सं
स्
का
र
है,
सत्
य,
अहिं
सा,
प्
रे
म,
करु
णा—
मे
रा
जी
वन-सा
र
है।
मा
थे
पर
चं
दन
हो
अथवा
मन
में
नि
र्
मल
भा
व
रहें,
हर
प्
रा
णी
में
ईश्
वर
दे
खूँ—
ऐसा
मे
रा
वि
चा
र
है।
वे
दों
की
वा
णी
से
सी
खा,
ज्
ञा
न
बाँ
टना
धर्
म
मे
रा,
उपनि
षदों
की
गहरा
ई
में
जी
वन
का
वि
स्
ता
र
है।
रा
म
मु
झे
मर्
या
दा
दे
ते,
कृ
ष्
ण
सि
खा
ते
कर्
मयो
ग,
बु
द्
ध
की
करु
णा,
शि
व
की
सा
धना—
मन
का
आधा
र
है।
गं
गा
जै
सी
पा
वन
धा
रा,
हि
मगि
रि
जै
सा
धै
र्
य
लि
ए,
भा
रत
की
मा
टी
से
मे
रा
जन्
म-जन्
म
का
प्
या
र
है।
मं
दि
र
मे
रे
श्
रद्
धा
-स्
थल
हैं,
पर
हृ
दय
सभी
के
लि
ए, “
वसु
धै
व
कु
टु
म्
बकम्”
ही
मे
रा
सच्
चा
परि
वा
र
है।
न
मैं
कि
सी
से
द्
वे
ष
करूँ,
न
कि
सी
का
ति
रस्
का
र,
अपने
पथ
पर
अडि
ग
रहूँ—
इतना
ही
अधि
का
र
है।
जो
नि
र्
बल
है,
उसकी
रक्
षा;
जो
दु
खी
है,
उसका
सा
थ,
से
वा,
त्
या
ग
और
परो
पका
र
ही
मे
रा
श्
रृं
गा
र
है।
मैं
हि
न्
दू
हूँ,
इसलि
ए
मन
में
सबके
हि
त
की
का
मना,
सर्
वे
भवन्
तु
सु
खि
नः—
मे
रे
जी
वन
का
उच्
च
वि
चा
र
है।
धर्
म
मु
झे
जो
ड़
ना
सि
खा
ए,
मा
नवता
मे
रा
मा
न
बने,
मे
री
पू
जा
का
प्
रथम
चरण—
मा
नव-मन
का
सत्
का
र
है। **
मैं
हि
न्
दू
हूँ,
मे
री
पहचा
न
सना
तन
सं
स्
का
रों
से,**
पर
हर
मा
नव
का
सम्
मा
न—
मे
रे
हृ
दय
का
आधा
र
है।