छोटी-छोटी रातें लंबी हो जाती हैं...
वो जो मिनटों में गुज़र जाती थीं सर्दियों की रातें,
अब कटती नहीं, चाहे कर लूं खुद ही से हज़ारों बातें।
घड़ी की सुइयां जैसे थम सी गई हैं दीवार पर,
एक अजीब सा पहरा है अब इस सूने मकान पर।
तारों को गिनते-गिनते भोर की किरण आ जाती है,
पर तेरी यादों की परछाईं, दिल से कहां जाती है?
"जब से तुम आए हो इस दिल के आशियाने में,
वक़्त भी साज़िश करने लगा है हमें तड़पाने में।"
यह रात कोई दुश्मन नहीं, बस ज़रा सा सताती है,
जो दूरी है दरमियां, उसका अहसास कराती है।
एक बेचैनी है जो सीने में मीठा सा दर्द जगाती है,
तन्हाई भी अब तन्हा नहीं, वो तेरा अक्स साथ लाती है।
यह जादू है उस पहली नज़र का, या तेरी सादगी का असर है,
कि अब मेरी हर रात, तेरे ख़्वाबों का ही एक सफ़र है।
ज़माना कहता है इसे पागलपन, पर मैं इसे इबादत कहता हूँ,
मैं जागती आंखों से भी, बस तेरे ही साथ रहता हूँ।
सूरज के ढलते ही एक नया इंतज़ार शुरू होता है,
इस बेताब दिल में सिर्फ़ तेरा ही शुमार होता है।
ये सच ही कहा है किसी ने, और मैंने आज़माया है,
कि चांद की चांदनी भी फिर आग लगाने आती है...
हां, छोटी-छोटी रातें भी तब लंबी हो जाती हैं,
जब किसी को, किसी से सच्चा प्यार हो जाता है।
घड़ी की सुइयां वही हैं, वही है रात का सन्नाटा,
पर जाने क्यूं आज इस वक़्त ने मेरा सुक़ून है काटा।
जो रातें कभी एक पल में, सोकर गुज़र जाती थीं,
जो नींदे ख़्वाबों के आने से पहले ही मुकर जाती थीं,
आज वो रातें सदियों की तरह भारी लगने लगी हैं,
करवटें बिस्तर पर, एक मुसलसल जंग की तरह चुभने लगी हैं।
दरो-दीवार से छनकर आती है तेरी ही परछाईं,
कमरे के हर कोने ने जैसे तेरी ही धुन है गुनगुनाई।
तन्हाई अब ख़ामोश नहीं, वो चीख-चीख कर बोलती है,
मेरे बंद ज़हन में, तेरी यादों की खिड़कियां खोलती है।
"अजीब कशमकश है इस दिल-ए-नादान की,
वक़्त थमता नहीं, और रात कटती नहीं।"
शाम ढलते ही एक अजब सा खौफ़ छा जाता है,
कि फिर से अंधेरा तन्हाई का पैग़ाम लाता है।
ये चांद जो कभी महज़ एक तारा लगता था आसमान में,
आज वो भी शरीक दिखता है, मेरे इस दर्द-ए-बायन में।
जब किसी की चाहत रूह में धीरे से उतर जाती है,
तो हंसती-खेलती ज़िंदगी भी, एक कशमकश में बिखर जाती है।
नींद आंखों की दहलीज़ से जैसे रूठ कर चली जाती है,
और जागती आंखों में बस एक ही सूरत ठहर जाती है।
यह इश्क़ का वो मर्ज़ है जिसकी कोई दवा नहीं होती,
इसमें आधी रात को उठकर रोने की कोई ख़ास वजह नहीं होती।
बस एक कसक होती है जो सीने में उठती है बार-बार,
कि काश! इस वक़्त तुम पास होते, मेरे यार।
टैप-टैप गिरती पानी की बूंदें भी अब साज़ लगती हैं,
हवा की हर एक सरसराहट, तुम्हारी ही आवाज़ लगती है।
मोबाइल की स्क्रीन को बेवजह बार-बार देखना,
और फिर एक ठंडी आह भरके, आसमान की तरफ़ ताकना।
लोग कहते हैं कि मोहब्बत इंसान को निखार देती है,
पर कोई ये नहीं कहता कि ये रातें कैसे गुज़ार देती है।
यह जो जागने का चस्का लगा है, ये कोई शौक़ नहीं है,
तुम्हारी यादों से दूर रहने का, इस दिल को कोई हक़ नहीं है।
तारे गिनते-गिनते जब उंगलियां थक जाती हैं,
तब जाकर कहीं ये बेताब सांसें थोड़ा संभल पाती हैं।
पर जैसे ही आंखें मूंदने की नाकाम कोशिश करता हूँ,
मैं फिर से तुम्हारी ही यादों के समंदर में उतरता हूँ।
यह लंबी रातें गवाह हैं मेरी इस बेपनाह शिद्दत की,
यह तन्हाइयां सुबूत हैं मेरी पाक-साफ़ मोहब्बत की।
अब इस दर्द में भी एक अजब सा नशा आने लगा है,
तेरा इंतज़ार ही अब मेरी ज़िंदगी को महकाने लगा है।
चाहे ये रातें और लंबी हो जाएं, या थम जाए ये समां,
तेरे सिवा अब इस दिल का कोई और नहीं है आशियां।
यह हक़ीक़त है, इस ज़माने ने भी हर बार मानी है,
कि जब किसी को किसी से सच्ची मोहब्बत हो जाती है...
तो ये छोटी-छोटी रातें, सदियों जैसी लंबी हो जाती हैं।