कच्चा धागा है ये दीवानगी
कच्चा धागा है ये दीवानगी,
न टूटे टूटता है, न छोड़े छूटता है।
एक जरा सी बात पर सुलग जाता है,
और कभी सदियों की खामोशी में भी जीता है।
समझदारी की दीवारों को ये पल में गिरा दे,
जो न करना हो कभी, ये हंसकर करा दे।
दुनिया कहती है जिसे कोरा पागलपन,
ये दिल उसी को अपनी जागीर बना दे।
नाप नहीं सकती इसे जमाने की कोई तराजू,
इसमें बह जाते हैं समंदर, टूट जाते हैं बाजू।
यह वो गिरह है जो दिखती नहीं आंखों से,
पर बांधे रखती है रूह को बिना किसी जादू।
धागा कच्चा है मगर हौसला फौलाद का है,
यह सिलसिला किसी अधूरी सी याद का है।
टूट भी जाए अगर, तो गांठ लग जाती है,
पर ये दिल फिर भी उसी मोड़ पर रुक जाता है।
कच्चा धागा है ये दीवानगी,
न टूटता है, न संभलता है,
एक छुअन से सिहर जाता है,
पर तूफ़ानों में भी थामे रखता है।
न कोई बंदिश है, न कोई पहरा,
फिर भी इसका रंग है सबसे गहरा।
बुना है इसे ख़्वाबों के ताने-बाने से,
यह वो सिरा है जो जुड़ा है ज़माने से।
उलझ जाए तो सांसें थमने लगती हैं,
सुलझ जाए तो राहें महकने लगती हैं।
कमज़ोर इतना कि पलक झपकते ही टूट जाए,
मज़बूत इतना कि रब भी चाहे तो न छूट पाए।
दीवानगी के रंग: एक गहरा अहसास
इस कच्चे धागे की फितरत बड़ी अजीब है। यह धागा रेशम सा नाजुक भी है और फौलाद सा मजबूत भी। जब हम किसी के आकर्षण या प्रेम में दीवाने होते हैं, तो तर्क और बुद्धि पीछे छूट जाते हैं।
कच्चा धागा है ये दीवानगी,
न टूटता है, न संभलता है,
बस एक अनकहे एहसास की आंच में,
मोम की तरह पिघलता है।
न कोई शर्त, न कोई सिरा है इसका,
बस रूह से रूह का एक राब्ता है,
लोग ढूंढते हैं जिसे ज़माने भर में,
वो रास्ता इस नादान दिल को मिलता है।
ज़माना तराशता रहा लोहे के मज़बूत रिश्ते यहाँ,
पर दीवानगी की इस सादगी के आगे ठहरता है कहाँ?
यह धागा रेशम सा नर्म है, पर इसकी पकड़ बड़ी सख़्त है,
इसने बदला है हर आफ़त को, बदला हर बिगड़ा वक़्त है।
इसमें कोई गिरह नहीं, कोई गाँठ नहीं, बस एक बहाव है,
चाहत की इस बेताबी में, छुपा एक गहरा ठहराव है।
फासले जितने भी हों, यह सिरा दिल से जुड़ा रहता है,
दुनिया कुछ भी कहे, यह दीवाना बस अपनी धुन में बहता है।
कच्चा धागा ही सही, पर यही तो इस मोहब्बत की शान है,
जो टूट कर भी न छूटे, वही तो असली दीवानगी का इम्तिहान है।
न इसे खोने का ख़ौफ़ है, न पाने की कोई ज़िद,
यह तो बस एक इबादत है, जो हर बंदिश से है मुक़्तसर।
यह दीवानगी कोई समझौता नहीं,
यह तो खुद को खोकर किसी को पाने का नाम है।
इस कच्चे धागे के सहारे ही सही,
ज़िंदगी की हर शाम, अब उसी के नाम है।
हँसते-हँसते इस कच्चे धागे पर चल पड़ते हैं,
जिन्हें अपनी दीवानगी पर ऐतबार होता है।
टूटने का डर तो बस एक बहाना है,
असल में यही तो सच्चा प्यार होता है।