मर जाऊँ या जी लूँ ज़रा
एक कशमकश है दिल में जगी,
एक आग है भीतर दबी हुई,
हर साँस एक सवाल पूछती है,
ज़िंदगी मुझे किस मोड़ पर ला खड़ी की है?
सोचता हूँ, इस दर्द से रिहाई पा जाऊँ,
सब छोड़-छाड़ कर कहीं दूर सो जाऊँ,
पर एक धड़कन हौले से कहती है,
रुक, अभी तो कुछ उम्मीद बाकी रहती है।
क्या थक कर हार मान लूँ इस राह में,
या फिर से पंख फैलाऊँ आस्माँ की चाह में?
क्या सिमट जाऊँ इस अँधेरे के साए में,
या एक दीया जलाऊँ ख़ुद के बनाए में?
ऐ वक़्त, तू ही बता मुझे क्या करना है,
इस बिखरे हुए ख़्वाब को फिर से भरना है।
अब फैसला इस दिल को ही करना होगा,
रोते-रोते या फिर हंसकर जीना होगा।
चलो, एक बार फिर ख़ुद को आज़माते हैं,
इस टूटे हुए दिल को फिर से सजाते हैं।
मौत तो एक रोज़ आनी ही है तय मानकर,
चलो, इस पल को थोड़ा और जी लेते हैं हँसकर।
यह कशमकश, यह उलझनें, यह सांसों का थपेड़ा,
दिल के किसी कोने में है ख़ामोशी का डेरा।
एक आस कहती है कि थक कर ठहर जाऊँ,
दूजी तड़प कहती है कि इक बार फिर मुस्काऊँ।
इस दोराहे पर खड़ी है ज़िंदगी बेबस बड़ी,
वक्त की दहलीज़ पर ठहरी है ख़्वाहिश की घड़ी।
समझ नहीं आता कि इस सफ़र को मोड़ दूँ कहाँ,
धुंधला सा दिखता है अब तो ज़मीं और आसमां।
दिल के सूने आंगन में एक सवाल गूंजता है हर दफ़ा—
'मरजाऊँ या जी लूँ ज़रा, ऐ ज़िंदगी! तू ही बता।'
टूटते हुए ख़्वाबों की किरचें चुभती हैं पाँव में,
तन्हाई की धूप तेज़ है, कोई साया नहीं छाँव में।
लड़ते-लड़ते थक चुका हूँ खुद अपनी ही तक़दीर से,
बाँध रखा है हालातों ने मुझे एक अदृश्य ज़ंजीर से।
कभी लगता है कि मिटा दूँ इस हस्ती का वजूद,
न रहे ये दर्द कोई, न रहे मेरा वजूद।
पर तभी ज़हन में किसी अपने का चेहरा उभर आता है,
डूबती हुई कश्ती को जैसे तिनके का सहारा मिल जाता है।
वो मासूम आँखें, वो उम्मीदें, वो बेज़ुबान सा वफ़ा—
कहते हैं धीमे से— 'मरजाऊँ या जी लूँ ज़रा, तू ही बता।'
इस कश्मकश की आग में तपकर लोहा भी पिघल जाए,
पर इंसान का ये दिल है जो आसानी से न बहल पाए।
एक पल को मौत का सन्नाटा बड़ा सुकूँ भरा लगता है,
अगले ही पल ये जीवन एक अनमोल ज़ीस्त सा सजता है।
शायद यही तो इम्तिहान है इस इंसानी अमूल्य चोले का,
सहन करना हर ज़ख्म, हर तमाचा इस वक़्त के शोले का।
चलो, इन मायूसियों के अंधेरे को चीर कर आगे बढ़ते हैं,
गिरे हैं अगर आज, तो कल फिर एक नई उड़ान भरते हैं।
ग़म की इस रात को अलविदा कह, ढूँढते हैं सवेरा नया,
अब इस दुविधा को छोड़, दिल ज़ोर से चीख कर कह उठा—
'बहुत देख ली मौत की परछाई, अब तो बस जी लूँ ज़रा!'