मन जो रूठा तो मना लेंगे हम
मन जो रूठा तो मना लेंगे हम,
तुम बस मुस्कुरा देना, सब भुला देंगे हम।
नाराजगी की इन छोटी-सी दीवारों को,
एक मीठी-सी बात से गिरा देंगे हम।
शिकायतें तुम्हारी सर-आँखों पर होंगी,
गलती हमारी हो, तो सिर झुका लेंगे हम।
पर यूँ खामोश रहकर दूरियाँ न बढ़ाओ,
तुम आवाज़ तो दो, दौड़े चले आएँगे हम।
ये जो वक़्त की थोड़ी-सी बेरुखी है,
इसे प्यार की चाशनी में डुबा देंगे हम।
तुम्हारे चेहरे पर शिकन अच्छी नहीं लगती,
अपनी खुशियों से तुम्हारी महफ़िल सजा देंगे हम।
रूठना-मनाना तो दस्तूर है मोहब्बत का,
इस बहाने ही सही, हक जता लेंगे हम।
मन जो रूठा तो मना लेंगे हम,
तुम बस हाथ थामना, साथ निभा देंगे हम
मन जो रूठा तो मना लेंगे हम,
दिल की दीवारों पर लगी,
धूल यादों की हटा देंगे हम।
ग़लती तुम्हारी हो या हमारी क्या फ़र्क़ पड़ता है,
मोहब्बत की अदालत में,
हर ख़ता खुद के सर उठा लेंगे हम।
तुम जो चुप हो तो ये सन्नाटा डराता है,
गुज़रा हुआ हर लम्हा,
आँखों में आँसू बन तैर जाता है।
इस बेरुखी की वज़ह चाहे जो भी हो,
अपने प्यार की तपिश से,
तेरी बेरुख़ी की बर्फ़ को पिघला देंगे हम।
मन जो रूठा तो मना लेंगे हम।
रूठना-मनाना तो दस्तूर है इस जहाँ का,
पर तुम रूठ कर कभी पराये मत होना।
तुम्हारी हर बेरुख़ी को अपनी चाहत से हरा देंगे हम,
तुम लाख छुपाओ अपनी धड़कन को हमसे,
तुम्हारे दिल की हर करवट को पहचान लेंगे हम।
हाँ... मन जो रूठा तो मना लेंगे हम।
मन जो रूठा तो मना लेंगे हम,
पलकों पर अपनी बिठा लेंगे हम।
शिकवे-शिकायत की जो दीवारें हैं,
प्यार की फूंक से ढहा देंगे हम।
तू जो खामोश है तो क्या हुआ,
तेरी खामोशी को भी सुन लेंगे हम।
दर्द के इस धुंधले से कोहरे में,
मुस्कुराहट का नया सूरज उगा देंगे हम।
वक़्त की लहरों ने अगर दूरी बढ़ाई,
तो यादों के पुल फिर से बना लेंगे हम।
तेरी बेरुखी के हर एक तीर को,
अपने सीने पर हंसकर सजा लेंगे हम।
ज़िंदगी की इस कशमकश में कहीं,
जो खो गया है वो सुकून पा लेंगे हम।
तू एक बार लौट कर देखने का इशारा तो कर,
तेरी राहों में अपनी पलकें बिछा देंगे हम।
मन जो रूठा तो मना लेंगे हम,
तुझे फिर से अपना बना लेंगे हम।