ये गमे ज़िंदगी
ये गमे ज़िंदगी, ये सफ़र के कांटे,
हौसलों ने हमारे मगर ज़ख्म बांटे।
कभी धूप तीखी, कभी छाँव ओझल,
कभी अपनी आँखें, कभी अश्क मेले।
मंज़िल की चाह में पाँव छाले हुए,
उजाले की ज़िद में हम काले हुए।
मिले मोड़ ऐसे कि राहें बदल दीं,
दुआओं ने अक्सर बलाएँ टाल दीं।
दर्द का फ़लसफ़ा
वक्त सिखा देता है हर ज़ख्म को सहना,
लहरों के साथ अब आ गया है बहना।
मुस्कुराहट के पीछे कई राज़ गहरे,
चेहरों पे दुनिया ने डाले हैं पहरे।
हंसकर गुज़ार दें हर इक शाम अपनी,
यही है इबादत, यही काम अपनी।
ग़म है तो क्या, अभी साँस बाक़ी है,
ख़ुद से ख़ुद की ये मुलाक़ात बाक़ी है।
"ग़म और ख़ुशी तो महज़ मुसाफ़िर हैं, दिल वो सराये है जहाँ दोनों का बसेरा है।”
ज़िंदगी के कैनवास पर ग़मों की स्याही अक्सर इतनी गहरी होती है कि वो महज़ एक अहसास नहीं, बल्कि एक मुकम्मल शख़्सियत बन जाती है। यहाँ 'ग़म-ए-जिंदगी' के मुख़्तलिफ़ रंगों को समेटती हुई एक नज़्म है:
ये ग़म-ए-जिंदगी
ये ग़म-ए-जिंदगी, ये थकावटों का सफ़र,
जैसे सहरा में कोई ढूंढता हो अपना घर।
कभी पलकों पे ठहरती है ओस की मानिंद,
कभी सीने में धड़कती है आग बनकर।
वो बचपन की मासूमियत कहाँ खो गई?
जहाँ काग़ज़ की कश्ती ही सबसे बड़ा ग़म थी,
अब तो लहरों के थपेड़ों से दोस्ती हो गई,
और आँखों की नमी भी अब बे-दम थी।
ख्वाहिशों के बाज़ार में जब सौदा करने निकले,
तो मालूम हुआ कि खुशियाँ बहुत महंगी हैं।
यहाँ ज़मीर बेचकर भी सुकून नहीं मिलता,
और वफ़ा की राहें बड़ी तंग और तन्हाई हैं।
मुस्कुराहटों के पीछे छिपे हैं कितने मरहले,
कोई देखे तो सही इस हँसी के पीछे का मंज़र।
हर शख़्स यहाँ एक बोझ उठाए फिरता है,
कोई यादों का मलबे, तो कोई टूटे हुए ख़्वाबों का खंजर।
मगर ऐ दिल! इस ग़म से घबराना कैसा?
ये तो वो आग है जो कुंदन बना देती है।
जो काँटों के दरमियान खिलना सीख ले,
वही कली तो गुलशन को महका देती है।
ये ग़म-ए-जिंदगी कोई सजा नहीं, एक इब्तिदा है,
ख़ुद को तराशने की, ख़ुद को पहचानने की।
रात जितनी भी काली हो, सहर तो आएगी,
यही रीत है इस जहाँ के हारने और जीतने की।