दर्द-ए-दिल: जीने का सबब, मरने का मज़ा
धड़कन में जो टीस उठे, उसे छुपा कर देख,
इस दर्द-ए-दिल को ज़रा गले से लगा कर देख।
ये जो ज़ख्म है, ये कोई मामूली मर्ज़ नहीं,
ये जीने का सलीका, और मरने का मज़ा देगा।
जब अश्क आँखों से बहकर होंठों पर आएँगे,
फ़साने मोहब्बत के ज़माने को याद आएँगे।
जो तड़प है सीने में, वो जीने की वजह बनेगी,
ये दर्द ही तुझे तेरी रूह से मिला देगा।
दवा की चाह में क्यों दर-ब-दर भटकता है?
ये तो वो नशा है जो हर सांस में खटकता है।
जीने में जो मज़ा न मिला कभी तुझे अब तक,
ये मौत के आगोश में वो सुकूँ ला देगा।
हंसते-हंसते कट जाएगी ये हिज्र की काली रात,
जब समझ आ जाएगी इस दर्द-ए-दिल की बात।
जिंदगी तो बस एक कशमकश है 'फ़ना' होने तक,
पर ये दर्द तुझे अमर होने का मज़ा देगा।
ये जो दर्द-ए-दिल मिला है मुसलसल मुझे,
ये ख़ाक में मिलाएगा या देगा मुकम्मल मुझे।
साँसों की डोरी अब खिंचने लगी है इस कदर,
कि हर ज़ख्म अब जीने का एक नया मज़ा देगा।
तड़प में जो बीती हैं रातें मेरी करवटें बदलते,
तारों ने भी देखा है मुझे मोम की तरह पिघलते।
अब इस तन्हाई से शिकायत कैसी, शिकवा कैसा,
ये खामोश मंज़र अब धड़कनों को सदा देगा।
लोग कहते हैं कि मोहब्बत में जान जाती है,
पर इस तड़प में ही तो रूह अपनी पहचान पाती है।
जीने की हसरत में जो घुट-घुट कर जिए हम,
अब ये दर्द ही हमें मौत का हसीं कबा (लिबास) देगा।
जब आख़िरी सांस थक कर बदन को छोड़ेगी,
जब ये दुनिया हमसे वफ़ा के सारे नाते तोड़ेगी।
तब उस ख़ामोशी के लम्हे में जो सुकून उतर आयेगा,
वो सूनापन ही इस बेबस दिल को जीने की वफ़ा देगा।
जो लहू बनकर आँखों से बहा है उम्र भर,
वही अब मेरी मय्यत पर बिखरेगा गुल बनकर।
घबराओ मत इस दर्द की शिद्दत से ऐ अश्क-बारों,
ये जाते-जाते तुम्हें भी मरने का एक अनूठा मज़ा देगा।
दर्द-ए-दिल जीने का और मरने का मज़ा देगा,
ये वो दरिया है जो प्यासे को दरिया देगा।
इश्क़ की राह में जो ज़ख़्म मिले हैं तुझको,
वही इक रोज़ तुझे जीने का सलीका देगा।
ग़म के साए में ही निखरती है इंसानियत अक्सर,
जो रोया नहीं कभी, वो मुस्कुराना क्या जानेगा?
चोट खाकर ही तो दिल शीशे से पत्थर बनता है,
इस तड़प में ही कोई अपनी हक़ीक़त पहचानेगा।
मौत तो बस एक बहाना है सुकूँ पाने का,
असल मज़ा तो इस कश्मकश में जीने का है।
ज़हर जो हँस के पी लिया आसिफ़ ने महफ़िल में,
वही तो लुत्फ़ उस ख़ास बज़्म के मीने का है।
इस दर्द को सीने से लगा, ये रफ़ीक़-ए-सफ़र है तेरा,
ये तुझे ख़ाक से उठा कर आसमाँ का पता देगा।
दर्द-ए-दिल जीने का और मरने का मज़ा देगा,
ये वो तूफ़ान है जो कश्ती को साहिल से मिला देगा।
ये जो दर्द-ए-दिल है, कोई रोग नहीं, कोई अभिशाप नहीं,
यह तो रूह का वो मरहम है, जो मिलता सबको हर बार नहीं।
जिसने न झेला हो सीने में सुलगता हुआ कोई अंगारा,
उसने भला कहाँ जाना, क्या होता है ज़िंदगी का किनारा?
जब दिल टूटता है, तो एक नई बज़्म सज़ती है,
धड़कनों की महफ़िल में फिर एक नई गूँज उठती है।
आँसुओं की हर एक बूँद, आँखों को एक नया नूर देती है,
यह बेबसी ही तो इंसान को जीने का असल शऊर देती है।
हाँ, यह दर्द-ए-दिल ही है, जो जीने का असली मज़ा देगा,
तुम्हारी सूखी, बेजान हसरतों को एक नया नया सवेरा देगा।
जब तक इस दिल में कोई चुभन, कोई टीस बाकी है,
समझो कि इस मिट्टी के पुतले में अभी जान बाकी है।
बिना ठोकर के जो गुज़र जाए, वो रास्ता ही क्या?
बिना रोए जो कट जाए, उस ज़िंदगानी से वास्ता ही क्या?
यह दर्द ही तुम्हें सिखाएगा कि मुस्कुराना किसे कहते हैं,
ग़म के घने तूफ़ानों के बीच, सुकून से रहना किसे कहते हैं।
और जब इस सफ़र की आख़िरी शाम ढलने लगेगी,
जब मौत की ठंडी हवा, इस बदन को छूकर गुज़रने लगेगी,
तब वो मौत, कोई ख़ौफ़नाक मंज़र या सज़ा नहीं लगेगी,
बल्कि इस थके हुए मुसाफ़िर को, एक मखमली रज़ा लगेगी।
जिसने ज़िंदगी को दर्द के हर एक कतरे के साथ जिया है,
जिसने इस ज़हर-ए-इश्क़ को हँसते-हँसते पिया है,
उसे मौत का वो आख़िरी लम्हा, एक नया सुरूर देगा,
बरसों की इस रूहानी तड़प को, मुकम्मल सुकून देगा।
तब मौत कोई अंत नहीं, एक ख़ूबसूरत सा अंजाम होगी,
दर्द से छूटे हुए इस दिल की, वो सबसे हसीं शाम होगी।
वो मरना भी फिर एक जश्न, एक मुकम्मल रज़ा देगा,
यह दर्द-ए-दिल तुम्हें जीने का सलीका, और मरने का मज़ा देगा।