उठो, ये सुबह बुलाती है, तेरा नाम करना है! (oye)
हाथों की इन लकीरों में, तू क्यों तक़दीर परखता है?
मेहनत की भट्टी में खुद को, तू सोने सा निखार ले!
बैठ किनारे लहरें गिनने से, मोती कहाँ मिलेंगे?
गोताखोर वही बनता है, जो गहराई में उतरता है।
खुद का भाग्य विधाता बन, (वाह!) अपनी मशाल जला!
चमकेगा तेरा भी सूरज, तू बस पैर चला!
मेहनत के दम पर, मरुस्थल में उपवन खिला!
हो हो! डॉ. संजय का है यही कहना, हर पल है जीत का रास्ता!
बाधाओं की क्या हस्ती है, जो तुझको रोक पाएंगी?
तेरी मेहनत की गर्जना से, वो खुद ही झुक जाएंगी।
दुनिया जब गहरी नींद में सोए, तू अपना भाग्य रच ले,
प्रेम कर अपने काम से, मंजिल खुद आएगी मिलने।
खुद का भाग्य विधाता बन, (वाह!) अपनी मशाल जला!
चमकेगा तेरा भी सूरज, तू बस पैर चला!
मेहनत के दम पर, मरुस्थल में उपवन खिला!
हो हो! डॉ. संजय का है यही कहना, हर पल है जीत का रास्ता!
लोहा तपे, सोना निखरे, हीरा खूब चमके! (कया बात!)
सूरज सा जलना है, नदियाँ सा बहना है,
डॉ. संजय का ये गीत, याद रखना! (है!)